साप्ताहिक स्पीक अप कार्यक्रम की 232 वीं कड़ी में बोले कांग्रेस नेता
नई दिल्ली। न्यूनतम मजदूरी और मजदूर संगठनों के ख़िलाफ़ मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की भाषा सामंती और पूंजीपतियों के ग़रीब विरोधी तर्कों को न्यायिक वैधता देने का प्रयास है. वहीं असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की संविधान विरोधी सांप्रदायिक भाषा पर न्यायपालिका की आपराधिक चुप्पी भी चिंता का विषय है.
शाहनवाज़ आलम ने कहा कि न्यायपालिका का एक बड़ा हिस्सा राज्य, सरकार, सत्ताधारी दल, बहुसंख्यक, सवर्ण और मालिकों के पक्ष में खड़ा होता जा रहा है जबकि उसकी ज़िम्मेदारी संविधान और उसके तहत नागरिकों को मिले अधिकारों के पक्ष में खड़े होने की थी. उन्होंने कहा कि जब यूपीए सरकार ने मनरेगा के तहत न्यूनतम मजदूरी तय की थी तब सामंती तबकों ने इसे कमज़ोर तबकों से कम पैसे पर मजदूरी कराने की परंपरा पर हमला बताया था. इसीतरह फैक्ट्रियों के मालिक भी मजदूर यूनियनों और उनके अधिकारों के संघर्षों को बदनाम करने के लिए उन्हें विकास में बाधा बताते थे. मजदूरों की पृष्ठभूमि पर बनी फ़िल्मों में खलनायकों की भूमिका में मालिकों को ऐसी भाषा बोलते देखा जाता था. लेकिन आज न्यायपालिका के जजों को भी वही भाषा बोलते देखा जाना दुखद है. मुख्य न्यायाधीश को अपने गरीब और मज़दूर विरोधी टिप्पणी को वापस लेना चाहिए.
कांग्रेस नेता ने कहा कि असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के लगातार मुस्लिम विरोधी हिंसक भाषा बोलने पर न्यायपालिका द्वारा संज्ञान न लिया जाना न्यायपालिका के एक हिस्से के आरएसएस के साथ आपराधिक गठजोड़ को उजागर करता है. इसके ख़िलाफ़ नागरिक समाज से मुख्य न्यायाधीश को उनकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी को याद दिलाने के लिए जल्दी ही व्यापक अभियान चलाया जाएगा.
