मां का दूध बच्चों के लिए अमृत समान होता है, ये तो हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि यह सिर्फ पोषण ही नहीं देता, बल्कि बच्चे के डीएनए की संरचना में भी कुछ बहुत खास बदलाव करता है?
हाल ही में खून के नमूनों पर हुए एक शोध में यह दिलचस्प और चौंकाने वाली बात सामने आई है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि इस नई रिसर्च में बच्चों की सेहत और उनके डीएनए को लेकर क्या-क्या खुलासे हुए हैं।
रिसर्च में क्या सामने आया?
स्पेन के ‘बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ’ और ब्रिटेन की ‘एक्सेटर और ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी’ के वैज्ञानिकों ने मिलकर यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। इस रिसर्च टीम ने कुल 3,421 बच्चों के खून के नमूनों की जांच की।
इस दौरान दो तरह के बच्चों के बीच तुलना की गई:
पहले वो, जिन्हें जन्म के बाद शुरुआती कम से कम तीन महीनों तक सिर्फ मां का दूध पिलाया गया था।
दूसरे वो, जिन्हें मां का दूध नहीं मिला था।
जांच में यह बात सामने आई कि जिन बच्चों ने तीन महीने तक सिर्फ मां का दूध पिया था, उनके डीएनए में ‘एपिजेनेटिक मार्कर’ (यानी डीएनए में होने वाले केमिकल बदलाव) पाए गए।
इम्यूनिटी और विकास से जुड़े जींस पर दिखा सीधा असर
शोधकर्ताओं ने पाया कि मां का दूध पीने वाले बच्चों में ‘डीएनए मिथाइलेशन’ नाम की एपिजेनेटिक प्रक्रिया के निशान काफी ज्यादा थे। सबसे खास बात यह है कि ये निशान शरीर के उन जींस पर अधिक पाए गए, जो सीधे तौर पर बच्चे की इम्युनिटी और उसके विकास से जुड़े होते हैं। यह बदलाव उन बच्चों की तुलना में औसतन कहीं अधिक था, जिन्हें मां का दूध नसीब नहीं हुआ था।
क्या है एपिजेनेटिक्स और ‘ऑफ स्विच’ का विज्ञान?
विज्ञान के इन भारी-भरकम शब्दों को आसान भाषा में ऐसे समझें:
एपिजेनेटिक्स: यह हमारे जींस और हमारे आस-पास के पर्यावरण के बीच का तालमेल है। इसी आपसी असर से यह तय होता है कि कोई जीन कैसा व्यवहार करेगा।
डीएनए मिथाइलेशन: यह प्रक्रिया शरीर में एक ‘ऑफ स्विच’ की तरह काम करती है। इसका काम किसी भी जीन को खुद को अभिव्यक्त करने से रोकना होता है। यह प्रक्रिया भ्रूण के विकास, जीनोमिक स्थिरता और शरीर के अन्य जरूरी कामों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
अभी भी असमंजस में हैं वैज्ञानिक
यह पूरी स्टडी ‘क्लीनिकल एपिजेनेटिक्स’ नाम के मशहूर जर्नल में प्रकाशित हुई है। हालांकि, इस शोध में एक बात स्पष्ट की गई है- रिसर्च में डीएनए पर पड़े इन निशानों को तो देखा गया, लेकिन यह नहीं परखा गया कि इन एपिजेनेटिक बदलावों का असल में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता या उनके शारीरिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ा।