एअर इंडिया की फ्लाइट 182 ‘कनिष्क’ बम धमाके को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। पीड़ितों के परिवारों ने चिंता जताई है कि रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) 1985 के इस आतंकी हमले की जांच को कम कर सकती है और इसे निष्क्रिय कैटेगरी में डाल सकती है।
NDTV की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस महीने की शुरुआत में RCMP के सीनीयर अधिकारियों के कहने पर पीड़ित परिवारों के साथ एक मीटिंग हुई थी। जिसमें ये फैसला बताया गया था। इस खबर ने उन परिवारों को हैरान कर दिया है, जो चार दशकों से ज्यादा समय से उस बम धमाके के बारे में जवाब पाने की कोशिश कर रहे हैं। इस हादसे में 329 लोग मारे गए थे, जिनमें 268 कैनेडियन नागरिक शामिल थे। कनाडा के अधिकारी इस हमले को देश के इतिहास का सबसे घातक आतंकी हमला मानते हैं।
पीड़ितों ने फैसले का किया विरोध
पीड़ित परिवार के सदस्य और कनिष्क फाउंडेशन के चेयरमैन संजय लाजर ने कनाडा के पीएम मार्क कार्नी को एक भावुक पत्र लिखा और मामले की जांच बंद करने की किसी भी कोशिश का विरोध किया। लाजर का कहना है कि 23 जून 1985 की त्रासदी में उन्होंने अपने माता-पिता और छोटी बहन को खो दिया था और वे दशकों से न्याय पाने की कोशिश कर रहे हैं।
लाजर ने कनाडा के पीएम को 16 सितंबर को पत्र लिखा जिसमें उन्होंने कहा, ‘कि टोरंटो में 12 सितंबर को हुई एक बैठक के बाद उन्हें गहरा सदमा लगा, जिसमें परिवारों को जांच के भविष्य के बारे में जानकारी दी गई थी।
लाजर ने पत्र में क्या लिखा
कनिष्क फाउंडेशन के चेयरमैन संजय लाजर ने पत्र में कहा कि परिवारों को बताया गया कि टास्क फोस्र में कटौती हो सकती है और मामले को निष्क्रिय करने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं। परिवारों के लिए इस संभावना ने उस त्रासदी के सबसे गहरे घावों को ताजा कर दिया है, जिससे वो कभी पूरी तरह उबर नहीं पाए। पीड़ित परिवारों की चिंता 1985 में हुई घटना के बारे में नहीं है, बल्कि इस बात को लेकर है कि अब क्या हो रहा है।
अपने पत्र में लाजर कहते हैं कि दशकों की जांच के बाद परिवारों से नई जानकारी या सुराग देने के लिए कहना बहुत दुखद था. परिवारों के लिए, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चार दशकों से चल रही जांच अब मुख्य रूप से पीड़ितों के रिश्तेदारों द्वारा दी गई जानकारी पर निर्भर होनी चाहिए, जबकि जांचकर्ता खुद वह जानकारी नहीं जुटा पाए हैं।
पत्र में आरोप लगाया गया है कि जांच पर सबूतों के गायब होने, सर्विलांस रिकॉर्डिंग के डिलीट होने और गवाहों की मौत या उन्हें मिली धमकियों का असर पड़ा है। पत्र में तर्क दिया गया है कि इन्हीं कमियों की वजह से दो आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सका। ये दावे परिवार की ओर से जांच जारी रखने की मांग का हिस्सा हैं और इन्हें अलग-अलग आपराधिक मुकदमों या सरकारी जांच से सामने आए नतीजों से अलग करके देखा जाना चाहिए।
पीएम मोदी को भी भेजी चिट्ठी
इस चिट्ठी की कॉपी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, दोनों देशों के विदेश मंत्रियों, कनाडा के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री, कनाडा और ब्रिटिश कोलंबिया के अटॉर्नी जनरल और RCMP के वरिष्ठ अधिकारियों को भी भेजी गई है. इसलिए, यह मामला अब सिर्फ़ पुलिस की अंदरूनी जांच तक सीमित नहीं रहा है। अब यह एक राजनीतिक और सार्वजनिक मुद्दा बन गया है कि कनाडा अपने आधुनिक इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक से कैसे निपटना चाहता है।
कैसे हुआ था एअर इंडिया बम धमाका?
एअर इंडिया बम धमाका कोई गुमनाम ऐतिहासिक अपराध नहीं है। यह कनाडा के आतंकवाद के इतिहास और उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा प्रणाली के विकास में एक अहम घटना बनी हुई है। खुद पीएम कार्नी ने जून 2026 में 41वीं बरसी पर 329 पीड़ितों को याद किया और फ्लाइट 182 को कनाडा के इतिहास का सबसे घातक आतंकवादी हमला बताया।
23 जून 1985 को एअर इंडिया की फ्लाइट 182 मॉन्ट्रियल से लंदन जा रही थी, तभी आयरलैंड के तट के पास अटलांटिक महासागर के ऊपर उसमें एक बम धमाका हुआ। इस हादसे में विमान में सवार सभी 329 लोगों की मौत हो गई।
मरने वालों में कनाडा, भारत और दूसरे देशों के नागरिक शामिल थे, जिनमें से ज्यादातर कनाडा के नागरिक थे। यह हमला कनाडा में हुआ अब तक का सबसे घातक आतंकवादी हमला है। लगभग उसी समय, इसी साजिश से जुड़ा एक और बम टोक्यो के नारिता एयरपोर्ट पर फटा, जिसमें सामान संभालने वाले दो कर्मचारियों की मौत हो गई। ये दोनों घटनाएं एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय जांच का हिस्सा बनीं।
एअर इंडिया पर हुआ हमला बहुत बड़े पैमाने पर था। इसमें न सिर्फ बहुत से लोगों की जान गई, बल्कि इस हमले ने कनाडा की इंटेलिजेंस, सुरक्षा और कानून व्यवस्था प्रणालियों की गंभीर कमियों को भी उजागर किया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस जॉन मेजर की अध्यक्षता में हुई सार्वजनिक जांच में यह पता लगाया गया कि बम धमाके से पहले और बाद में क्या-क्या गड़बड़ियां हुई थीं।कनाडा सरकार ने माना है कि जांच में देश की सुरक्षा और इंटेलिजेंस व्यवस्था की बड़ी खामियों का पता चला।