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हरीश राणा केस में SC ने इच्छामृत्यु का सुनाया फैसला, कर्ज में डूबा पिता, बिक गया आशियाना और टूट गया हौसला

हरीश राणा केस  |  गाजियाबाद के एक परिवार की यह कहानी बेहद दर्दनाक है। कहा जाता है कि दुनिया में सबसे बड़ा दुख तब होता है जब किसी पिता को अपने जवान बेटे की अर्थी उठानी पड़ती है। लेकिन सोचिए उस पिता की हालत क्या रही होगी, जो पिछले 13 सालों से हर दिन अपने बेटे के लिए भगवान से मौत मांग रहा हो।

यह कहानी पिता अशोक राणा और मां निर्मला देवी की है। उनका बेटा हरीश राणा साल 2013 में एक हादसे का शिकार हो गया था। उस समय हरीश चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष का छात्र था और यूनिवर्सिटी के पास एक पीजी में रहता था।

एक दिन पीजी की चौथी मंजिल की बालकनी से उसका संतुलन बिगड़ गया और वह नीचे गिर गया। इस हादसे में उसके सिर में गंभीर चोट आई, सिर की हड्डियां टूट गईं और रीढ़ की हड्डी को भी भारी नुकसान पहुंचा। उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे वेंटिलेटर पर रख दिया।

इसके बाद हरीश वेजिटेटिव स्टेट में चला गया। यानी वह न बोल सकता था, न देख सकता था और न ही अपने शरीर की तकलीफ बता सकता था। पिछले 13 सालों से वह बिस्तर पर ही पड़ा रहा, मशीनों और ट्यूबों के सहारे जिंदा था। उसकी मां हर दिन उसकी देखभाल करती रही और रात-रात भर उसकी ट्यूब साफ करती थी।

आखिरकार माता-पिता ने बेटे को इस दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए कोर्ट में इच्छामृत्यु (Euthanasia) की मांग की। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया और हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।

कोर्ट ने कहा कि जीने के अधिकार (Right to Life) में गरिमा के साथ मरने का अधिकार (Right to Die with Dignity) भी शामिल है, खासकर तब जब जीवन केवल मशीनों के सहारे चल रहा हो। यह फैसला हरीश के लिए दर्द से मुक्ति और उसके परिवार के लिए एक बेहद भावुक पल बन गया।

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