राज्यसभा में एक सदस्य ने सोमवार को सरकार से अनुरोध किया कि वह परोक्ष इच्छामृत्यु को लेकर कानून बनाए। गौरतलब है कि पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 13 वर्षों से कोमा में रहे हरीश राणा को परोक्ष इच्छामृत्यु की अनुमति दी। किसी व्यक्ति की जीवन रक्षक प्रणाली हटाने और आवश्यक उपचार बंद करके उसे प्राकृतिक रूप से मरने देने की प्रक्रिया को परोक्ष इच्छामृत्यु कहते हैं।
शून्यकाल में इस मामले को उठाते हुए आइयूएमएल के हारिस बीरन ने सरकार से अनुरोध किया कि वह विधि आयोग द्वारा सिफारिश किए गए मेडिकल ट्रीटमेंट आफ टर्मिनली इल पैशेंट्स (एंड-आफ-लाइफ केयर) विधेयक को पेश करे और प्रत्येक जिला अस्पताल और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में पैलेयेटिव केयर इन्फ्रास्ट्रक्चर को अनिवार्यता सुनिश्चित करे।
बीरन ने कहा कि विधि आयोग की 196वीं रिपोर्ट में 2006 में परोक्ष इच्छामृत्यु के मुद्दे की विस्तार से जांच की थी और मसौदा विधेयक संलग्न किया था, लेकिन संसद ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में अरुणा शानबाग मामले में हस्तक्षेप किया था। 2012 में विधि आयोग की 241वीं रिपोर्ट में फिर से ड्राफ्ट विधेयक का प्रस्ताव रखा।
सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 2018 में कामन काज मामले में दिशा-निर्देश जारी किए, यह स्पष्ट करते हुए कि ये केवल तब तक लागू होंगे जब तक संसद कानून पारित नहीं करती। इसमें कहा गया था कि कोमा जैसी स्थिति में पहुंचे रोगी की जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के संबंध में विशेषज्ञ राय के लिए एक प्राथमिक और एक सेकेंड्री चिकित्सा बोर्ड का गठन करना होगा। उसकी राय पर ही तय दिशा-निर्देशों के मुताबिक परोक्ष इच्छामृत्यु की इजाजत हो सकती है।
