.जिसने दुखों को हराकर रचा इतिहास।
.द्रौपदी मुर्मू: हौसले की वो कहानी जो प्रेरित करती है।
.गांव से राष्ट्रपति भवन तक का ऐतिहासिक सफर।
.पति और बेटों को खोया, फिर भी नहीं टूटीं द्रौपदी मुर्मू।
लखनऊ।एक ऐसा जीवन, जिसमें गरीबी थी, संघर्ष था, अपनों को खोने का दर्द था… लेकिन हार नहीं थी। यह कहानी है भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की।
ओडिशा के मयूरभंज जिले के एक छोटे से आदिवासी गांव में 20 जून 1958 को जन्मीं द्रौपदी मुर्मू का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। गांव की कच्ची पगडंडियों से शुरू हुआ उनका सफर एक दिन राष्ट्रपति भवन तक पहुंचेगा, यह शायद किसी ने नहीं सोचा था।
पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक के रूप में काम किया। लोगों की सेवा का जज्बा उन्हें राजनीति में ले आया। उन्होंने पार्षद से लेकर विधायक और मंत्री तक की जिम्मेदारियां निभाईं। अपनी सादगी और जनसंपर्क के कारण वे लोगों के बीच लोकप्रिय होती गईं।
लेकिन जीवन ने उनकी सबसे कठिन परीक्षा तब ली, जब उन्होंने कुछ ही वर्षों में अपने पति, दो बेटों और मां को खो दिया। एक के बाद एक हुए इन दुखों ने किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकता था। लेकिन द्रौपदी मुर्मू ने खुद को संभाला और समाजसेवा के रास्ते पर आगे बढ़ती रहीं।
साल 2015 में वे झारखंड की पहली महिला राज्यपाल बनीं। उनकी कार्यशैली और सादगी ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। फिर आया साल 2022, जब देश ने इतिहास बनते देखा। द्रौपदी मुर्मू भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति चुनी गईं।
एक छोटे गांव की बेटी से देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक का यह सफर सिर्फ एक व्यक्ति की सफलता नहीं, बल्कि करोड़ों सपनों की जीत है।
द्रौपदी मुर्मू की कहानी बताती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, अगर हौसले बुलंद हों तो मंजिल राष्ट्रपति भवन भी हो सकती है।
