हाल के वर्षों में 50 वर्ष से कम आयु के युवाओं में कैंसर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसके मुख्य कारणों में खराब लाइफस्टाइल, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड से भरपूर खान-पान, मोटापा और सेडेंटरी लाइफस्टाइल शामिल हैं। पर्यावरणीय कारक जैसे प्रदूषण और कुछ बैक्टीरिया भी इसमें भूमिका निभाते हैं।
कैंसर को लंबे समय तक बढ़ती उम्र की बीमारी माना जाता रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में एक चिंताजनक बदलाव देखने को मिल रहा है। दुनिया के कई हिस्सों में 50 वर्ष से कम आयु के युवाओं में कैंसर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।
हालांकि, अब भी कैंसर के ज्यादातर मामले बुजुर्गों में ही पाए जाते हैं, लेकिन पिछली पीढ़ियों की तुलना में आज के युवा इस बीमारी की चपेट में जल्दी आ रहे हैं। एंड्रोमेडा कैंसर अस्पताल, सोनीपत के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी चेयरमैन डॉ. अरुण कुमार गोयल के अनुसार, इस बदलते ट्रेंड के पीछे कई गंभीर कारण छिपे हैं। आइए जानें इनके बारे में।
खराब लाइफस्टाइल और खान-पान का असर
इस बढ़ते खतरे का एक मुख्य कारण हमारी बदलती लाइफस्टाइल और खान-पान है। बचपन से ही बढ़ता मोटापा और वजन कई तरह के अर्ली-ऑनसेट कैंसर, जैसे कि कोलोरेक्टल और एंडोमेट्रियल कैंसर से सीधे तौर पर जुड़ा है। आजकल के युवाओं की डाइट में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, चीनी और अनहेल्दी फैट की मात्रा बढ़ गई है, जबकि फाइबर कम हो गया है।
यह असंतुलन शरीर में सूजन और मेटाबॉलिक गड़बड़ी पैदा करता है, जो कैंसर के जोखिम को बढ़ा देता है। साथ ही, घंटों बैठकर काम करना और फिजिकल एक्टिविटी की कमी इस स्थिति को और गंभीर बना रही है।
पर्यावरण और माइक्रोब्स की भूमिका
कैंसर के इस बढ़ते खतरे के पीछे पर्यावरणीय से जुड़े कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं। आंतों के भीतर मौजूद ई-कोलाई जैसे कुछ बैक्टीरिया के संपर्क में आने से डीएनए को नुकसान पहुंच सकता है, जो बाद में कोलोरेक्टल कैंसर का कारण बन सकता है। इसके अलावा, वायु प्रदूषण, कीटनाशकों और हार्मोन को प्रभावित करने वाले केमिकल के लंबे समय तक संपर्क में रहने को भी एक बड़ा कारण माना जा रहा है। हालांकि, इस पर अभी शोध जारी है।
बेहतर जांच और बर्थ कोहोर्ट इफेक्ट
बेहतर इमेजिंग तकनीक, स्क्रीनिंग और बढ़ती जागरूकता की वजह से अब कैंसर की पहचान शुरुआती चरणों में और कम उम्र में ही संभव हो पा रही है। वहीं, शोधकर्ताओं ने बर्थ कोहोर्ट इफेक्ट भी देखा है, जिसका मतलब है कि हर नई पीढ़ी को अपने जीवनकाल में कम उम्र में ही कैंसर होने का जोखिम अपनी पिछली पीढ़ी की तुलना में ज्यादा होता जा रहा है।
इन कैंसरों का बढ़ा जोखिम
युवा वयस्कों में खासतौर से कोलोरेक्टल, ब्रेस्ट, थायरॉइड, टेस्टिकुलर, पेनक्रियाटिक, किडनी, लिम्फोमा और मेलानोमा जैसे कैंसर के मामलों में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। हालांकि, बुजुर्गों की तुलना में जोखिम अब भी कम है, लेकिन यह लगातार बढ़ रहा है।
