आगरा के एक स्कूल ने 32 साल पहले प्रवेश के समय छात्र के पिता से एडमिशन फीस के साथ चार हजार रुपये जमानत राशि के रूप में भी लिए। सत्र समाप्त होने पर जमानत राशि वापस करने का वादा किया। लेकिन, दो साल बाद सत्र संपन्न होने पर रकम वापस नहीं की। तत्कालीन आयोग अध्यक्ष ने 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित रकम लौटाने के आदेश किए। 30 साल बाद स्कूल प्रबंधन ने 40,210 रुपये का चेक दिया।
ये है मामला
उदय प्रकाश कुलश्रेष्ठ ने बेटे उत्कर्ष का एडमिशन 8 जनवरी 1992 को दहतोरा स्थित डाॅ. मारिया रेजीडेंशियल एकेडमी में कराया था। स्कूल के निर्देशानुसार, कार्यालय में फीस और अन्य मद के 20 हजार रुपये जमा कराए थे। धनराशि में से चार हजार रुपये जमानत के रूप में थे, जो सत्र समाप्ति के बाद स्कूल की ओर से छात्र को वापस किए जाने थे। जमा रकम की रसीद भी थी। सत्र समाप्ति होने के बाद 8 अप्रैल 1994 को उदय प्रकाश ने प्रधानाचार्य को प्रार्थनापत्र दिया। इसमें बेटे उत्कर्ष का शैक्षिक प्रमाणपत्र देने और जमानत राशि के चार हजार रुपये देने का आग्रह किया।
वापस नहीं की थी जमानत राशि
प्रबंधन ने जमानत राशि वापस नहीं की। इस पर उन्होंने वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव कुलश्रेष्ठ के माध्यम से 18 मई 1994 को उपभोक्ता आयोग में वाद प्रस्तुत किया। तत्कालीन आयोग अध्यक्ष ने 9 अक्तूबर 1996 को स्कूल प्रबंधन को आदेशित किया था कि वह मुकदमा दायर करने की तारीख से 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित वादी को 4 हजार रुपये वापस करे। एक हजार रुपये प्रतिकर अदा किया जाए।
अब आया .ये आदेश
मगर, तब स्कूल प्रबंधन ने रकम नहीं दी। अब स्कूल प्रबंधन ने उपभोक्ता आयोग प्रथम में 40,210 रुपये का चेक जमा कराया है। इस पर उपभोक्ता आयोग प्रथम के अध्यक्ष सर्वेश कुमार और सदस्य डा. अरुण कुमार ने उदय प्रकाश कुलश्रेष्ठ को चेक देने के आदेश किए।
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